मंटो: एक डेढ़ सेर का पत्थर

पंडित जी, आप केवल नेहरू हैं। मुझे खेद है कि मैं महज़ एक डेढ़ सेर का पत्थर हूं। पर अगर मैं एक बड़ी चट्टान होता तो खुद को उस नदी में गिरा देता जिसे आप बहने से रोक रहे हैं, ताकि आप अपने इंजीनियरों से बातचीत करने पर मजबूर हो जाएं कि इसे कैसे बाहर निकाला जाए।

साहित्य ऐसे झूठ होते हैं जिसमें सच्चाई होती है और जब ये झूठ ऐतिहासिक पात्र बोलते हैं तो उन्हें पढ़ना और भी जरूरी हो जाता है।

हालांकि, यदि सटीक स्मृतियों के रूप में देखा जाए तो शायद वह इतिहासकारों के लिए आदर्श प्रतीत न हों, पर अगर इतिहास खुद अमानवीयता, द्वेष और हिंसा की बातें करने लगे, तो सटीक स्मृतियों की बजाए ‘कराहटें’ ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती हैं। जिनकी अभिव्यक्ति हमें साहित्य में मिलती है और जब इस साहित्यिक झूठ में मंटों की कराहट हो तो उसे जरूर पढ़ना चाहिए। अब झूठ बोलने वाला आदमी खुद ही कहे,जिंदगी को वैसे ही दिखाना चाहिए जैसी वह है, न कि वह कैसी थी, कैसी होगी या कैसी होनी चाहिए…, तो फिर उसके झूठ को सच मानकर पढ़ लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए! खासकर तब, जब बात कराहटों की ही हो।

मंटो उर्दू कहानियों के चार स्तंभों (बाकि तीन कृष्ण चंदर, राजिंदर सिंह बेदी और इसमत चुगताई हैं) में से एक हैं। उन्होंने अपने प्रशंसक तथा दोस्त कमलेश्वर से कहा था- सदियां बूढ़ी हो जाती हैं लेकिन दर्द कभी बूढ़ा नहीं होता! इस बात का उल्लेख कमलेश्वर अपनी कहानी ‘आजादी मुबारक’ में करते हैं। मंटो भी कोई खूब बूढ़े होकर नहीं मरे थे। महज 42 साल की उम्र में कभी बूढ़े न होने वाले दर्द को झेलते हुए दुनिया को अलविदा कर गए थे।

 

कश्मीरी थे मंटो

उनके बारे में पाकिस्तानी-अमेरिकी इतिहासकार आयशा जलाल (Ayesha Jalal) बताती हैं कि वे कौन थे और किस घराने से उनके ताल्लुकात थे ? उनके बारे में वे लिखती हैं सआदत हसन मंटो का जन्म 11 मई 1912 को लुधियाना जिले में स्थित समराला में हुआ था। उनका कश्मीरी मुस्लिम व्यापारिक परिवार 19वीं सदी में कश्मीर से रवाना होकर पंजाब में बस गया था। उनके पिता ख्वाजा गुलाम हसन, एक प्रशिक्षित वकील थे। वे पंजाब जस्टिस डिपार्टमेंट के जज भी रह चुके थे। गुलाम हसन पक्के मुसलमान थे। अपने खाली समय में इस्लाम के लिए कार्य करते थे और जिहाद का असली अर्थ खोजने में लगे रहते थे।

मंटो भी खुद को कश्मीरी मानते थे। एक जगह वे उल्लेख करते हैं मैं कश्मीरी हूं। बहुत अरसा हुआ हमारे अब्बा को आजाद कश्मीर से हिजरत करके पंजाब आए और मुसलमान हो गए

मंटो ने यहां हिजरत (संकट के समय जन्म भूमि त्यागना) का जिक्र किया है। दरअसल 18वीं शताब्दी में कश्मीर में निरंकुश शासकों और जमींदारों से तंग आकर कईयों ने अपनी जन्मभूमि त्याग दी थी। मंटो का परिवार भी उन्हीं परिवारों में से एक था।

 

पढ़ाई में बहुत अच्छे नहीं थे

यदि उनकी शैक्षिक योग्यता की बात की जाए तो वे पढ़ाई में बहुत अच्छे नहीं थे। वे माध्यमिक स्तर की परीक्षा में दो बार फेल हो चुके थे तथा तीसरी बार जाकर ही परीक्षा में सफल रहें। कॉलेज के दिनों में भी मंटो को पढ़ाई के अलावा सब कुछ लुभाता था। इसी का नतीजा था कि वे कॉलेज के प्रथम वर्ष में भी फेल हो गए थे और बुरी संगत में भी पड़ गए थे। ‘गंजे फरिश्ते’ (मंटो की किताब जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी से जुड़े लोगों के संस्मरण लिखे हैं) में एक जगह वे उल्लेख भी करते हैं कि वे कितने नालायक थे। वे कहते हैं कि वे खुद को इन सबसे बाहर निकालने के लिए बरी आलिग (Bari Alig) के प्रति शुक्रगुजार हैं।

 

सिगरेट, दारू और किताबों का शौक फ़रमाते थे

मंटो सिगरेट, दारू और किताबों (सिलेबस से बाहर की किताबें ही रास आती थीं) के शौकीन थे, मतलब बहुत शरारती थे। मंटो के करीबी अघा खलश कश्मीरी (Aagha Khalash Kashmiri) उनकी शरारतों का जिक्र करते हैं। मंटो उन विद्यार्थियों में से थे जिनसे शिक्षक परेशान रहते थे।

कश्मीरी बताते हैं कि मंटो खुद को हेडमास्टर का बेटा बताकर किराए पर किताबें ले लिया करते थे और पढ़ने के बाद उन्हें आधी कीमत पर बेच दिया करते थे। इस कारण कई दफा हेडमास्टर को किताबों की कीमत चुकानी पड़ती थी। पर मंटो थे कि अपनी इन आदतों से बाज न आते थे। इस संदर्भ में कश्मीरी लिखते हैं दूसरे रोज पूछने पर मंटो ने बताया कि वह किताबें उधार लेकर पढ़ता है और पढ़ने के बाद सैकेण्ड हैंड बुक सेलर के पास फरोख्त कर देता है और उसी पैसे से सिगरेट खरीद लेता है। मुझ पर यह राज पहली बार खुला कि मंटो सिगरेट पीता है। उसने मेरी इस तरब का जायजा लेते ही झट से कहा, खलश साहिब, मैं घटिया किस्म के सिगरेट कभी नहीं खरीदता। घर से मिलने वाले पैसे बढ़िया सिगरेट की कफालत नहीं कर सकते

मंटो बहुत ज़्यादा दारू पिया करते थे। अच्छे दिनों (जब हिंदुस्तान में रहा करते थे) में अच्छी किस्म यानि महंगी वाली दारू पीते थे। बुरे दिनों (जब पाकिस्तान मे रहने लगे थे) में खराब किस्म यानि सस्ती वाली दारू पीने लगे थे। उन दिनों (विभाजन वाले दिनों की बात कर रहे हैं), जहां बाकि मर्द मार-पीट कर रहे थे, औरतों को बेईजत कर रहे थे, लोगों का खून कर रहे थे, वहीं मंटो अपने तंगी दिनों में सस्ती वाली दारू पी रहे थे और इतनी दारू पीने के बाद भी होश संभाले हुए थे।

मंटो की अशोक कुमार के साथ खूब बनती थी। उन पर उन्होंने अशोक कुमार: द एवरग्रीन हीरो नाम से एक संस्मरण भी लिखा था। दोनों की बहुत ज्यादा बनने का एक अहम कारण दोनों का शराबी होना भी था।

 

लिखते थे, लिखकर असहज करते थे

मंटो के बारे में ये कहना मुश्किल है कि उन्होंने अपना साहित्यिक करियर कहां से शुरु किया। पर विक्टर ह्यूगो (Victor Hugo)  के फ्रांसीसी उपन्यास ‘Last Gays of Condemned’ को उनके लेखन के प्रथम सफल प्रयास के रूप में देखा जा सकता है जो कि ‘एक असीर की सरगश्त’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। अपनी बड़ी सफलताओं से पूर्व भी मंटो लिखा करते थे। वे अखबारों के लिए खबरों और साहित्यिक पत्रिकाओं का अनुवाद करते थे।

मंटो अपने चरित्र-निर्माण का श्रेय बरी आलिग को देते हैं जिसे वे अपने लेखन में स्वीकारते भी हैं। वे कहते हैं आजकल मैं जो कुछ भी हूं इसको बनाने में सबसे पहले हाथ बरी साहिब का ही था। अगर अमृतसर में उनसे मुलाकात न होती और मुत्वीर तीन महीने उनकी सोहबत में न गुजरे होते तो यकीनन मैं किसी और रास्ते पर होता

सआदत हसन मंटो ने लगभग 200 छोटी कहानियां, एक दर्जन निबंध तथा नाटक लिखे। उन्होंने इकलौता उपन्यास ‘बगैर उन्वान’ लिखा है तथा कईयों का चरित्र चित्रण किया है। इनमें उनके मित्र तथा अभिनेता श्याम, नसीम बाबू, अशोक कुमार, नरगिस, नूर जहान, नवाब सितारा, नीना, बरी आलिग, इसमत चुगताई आदि शामिल हैं। उनका लेखन न केवल भारत और पाकिस्तान में बल्कि दूसरे कई देशों (खासकर उर्दू भाषी क्षेत्रों) में भी प्रसिद्ध है। मोजील, ठंडा गोश्त, टोबा टेक सिंह, खोल दो, सहाय आदि उनकी विशिष्ट कहानियां हैं।

मंटो जब लिखते थे तो कई लोग असहज हो जाते थे। मंटो असहज लिखते थे, ताकि सब सहज हो जाएं। पर कईयों के लिए यह समझना सहज नहीं था। इस कारण मंटो को अपनी कहानियों के लिए लगभग दर्जन भर कोर्ट केसिस का सामना करना पड़ा। मंटो की पहली कहानी तमाशा और अखिरी कहानी कबूतर और कबूतरी के बीच ऐसी कई कहानियां हैं जो विवादों से घिरी रहीं। इनमें बू, ठंडा गोश्त, लज्जत ए संग, काली सलवार, खोल दो आदि हैं।

मंटो अपने लेखन लज्जत-ए-संग के संदर्भ में कहते हैं, जमाने के जिस दौर से हम गुजर रहे हैं अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफसाने पढ़िए। अगर आप इन अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है ये जोमाना न काबिले बर्दाश्त है

लज्जत-ए-संग उनकी वही किताब है जिसमें उनकी वो तमाम कहानियां मौजूद हैं, जिन्होंने उन्हें एक बदनाम लेखक बनाया। कोट-कचहरी के चक्करों से परेशान मंटो ने गंजे फरिश्ते में लिखा था, सच पूछिए तो तबीयत इस कदर खट्टी हो गई थी कि जी चाहता था कि कोई चीज अलोट हो जाए तो आराम से किसी कोने में बैठकर चंद रोज कलम और दवात से दूर रहूं। दिमाग में खयालात पैदा हों तो उन्हें फासी के तख्ते पर डाल दूं

 

मंटो ने नेहरू से कहा था- मैं डेढ़ सेर का पत्थर हूं…

27 अगस्त, 1954 को मंटो ने आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखा था। इस पत्र में वे उनसे विभाजन को लेकर शिकायत करते हैं। मंटो ने ये शिकायत अपनी कहानियों में भी की है। पर नेहरू उनकी कहानियां नहीं पढ़ते थे। इसीलिए शायद निजी तौर पर शिकायत करनी पड़ी होगी। इसी पत्र में वे खुद को ‘डेढ़ सेर का पत्थर’ (किसी ने उन्हें बताया था कि मंटो का अर्थ डेढ़ सेर का पत्थर होता है) और उन्हें ‘नदी’ (नेहरू यानि नदी अथवा नहर) कहकर संबोधित करते हैं। वे कहते हैं पंडित जी, आप केवल नेहरू हैं। मुझे खेद है कि मैं महज एक डेढ़ सेर का पत्थर हूं। पर अगर मैं 30 या 40 हज़ार मउण्ड्स (मापने की एक इकाई जो लगभग 37 किलोग्राम के बराबर होती है) का एक बड़ी चट्टान होता तो खुद को उस नदी में गिरा देता जिसे आप बहने से रोक रहे हैं ताकि आप अपने इंजीनियरों से बातचीत करने पर मजबूर हो जाएं कि इसे कैसे बाहर निकाला जाए

वे उनके कश्मीरी होने की दुहाई देते हैं। कश्मीर के मुद्दे पर भी बात करते हैं। वे शिकायत करते हैं कि आप बड़े आदमी हैं, भारत जो कभी मेरा देश था, के नेता हैं। पर आपने कभी इस आदमी की फिक्र नहीं की। वे शिकायत करते हैं कि किस प्रकार भारत में प्रकाशक उनकी कहानियां बगैर उनकी मंजूरी के छाप रहे हैं, वो भी अजीबो-गरीब नामों के साथ। वे कहते हैं कि प्रकाशक उनका मजाक उड़ाते हैं। उदाहरण के लिए वे जिक्र करते हैं कि उनकी कहानियों के संकलन को एक प्रकाशक ने ‘मंटो की अश्लील कहानियां’ नाम से प्रकाशित किया। वे शिकायत करते हैं, आप मेरी कहानियां क्यों नहीं पढ़ते? जबकि आप खुद एक लेखक हैं। अगर आप पढ़ेंगे तो मुझे यकीन है कि वे आपको रास नहीं आएंगी। पर अगर नहीं पढ़ेंगे जो ज़्यादा खेद होगा। वे कहते हैं कि उन्होंने एक नई किताब लिखी है। इस किताब की एक प्रति वे उन्हें जरूर भेजेंगे। साथ ही यह उम्मीद भी जताते हैं कि नेहरू उसे पढेंगे।

अपने पत्र में वे कई जगह सेंटी हो जाते हैं। प्रकाशकों का गुस्सा नेहरू जी पर निकालते हैं। कहते हैं कि अगर मेरी नई किताब के साथ बदसलूकी हुई तो एक दिन दिल्ली आ जाएंगे और नेहरू जी का गला पकड़ लेंगे और उन्हें जाने नहीं देंगे। वे छोटी-छोटी खुशियों के लिए तरसते जान पड़ते हैं। उदाहरण के लिए, एक जगह वे कहते हैं, शायद यह बब्बूगोशा का मौसम है। मैंने यहां बहुत से गोश खाए हैं। पर बब्बूगोशा खाए मुझे बहुत अरसा हो गया

 

विभाजन और मंटो

मंटो की बात हो और विभाजन की बात न हो ऐसा कैसे हो सकता है! मंटो ने अपनी कई बेहतरीन कहानियां विभाजन के दौरान ही लिखी थीं। इन कहानियों का ऐसा जबर्दस्त प्रभाव है कि कई दफा लोग भूल जाते हैं कि मंटो ने विभाजन के अलावा भी बहुत कुछ लिखा है। मंटो ने विभाजन का कोई व्यवस्थित इतिहास नहीं, बल्कि उस पर अफसाने लिखे थे। मगर फिर भी ये अफसाने विभाजन को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

मंटो कोई राजनीतिज्ञ नहीं थे। उन्होंने खुद विभाजन का दर्द झेला था। उनकी मानवीयता किसी भी तरह के धार्मिक लेबल को स्वीकार नहीं करती। क्रूरता तथा हिंसा को बर्दाश्त करने का विरोध करती हैं, जो उन्हें उनके समकालीनों से भिन्न बनाता है।

मंटो एक स्वतंत्र विचारक थे। ज़िंदगी को वैसे ही दिखाते थे जैसी वह है। आज़ादी (ज़्यादा सटीक तौर पर कहें तो विभाजन) वाले दिन को उन्होंने कुछ इस प्रकार बयां किया था-

14 अगस्त का दिन मेरे सामने बाम्बे में मनाया गया। पाकिस्तान और दोनों मुल्क आज़ाद करार दिए गए। समझ में नहीं आता कि हिंदुस्तान अपना वतन है या पाकिस्तान ? हिंदुस्तान आज़ाद हो गया, पाकिस्तान आलम-ए-वजूद में आते ही आज़ाद हो गया था लेकिन इनसान इन दोनों हालातों में गुलाम था। तास्सुब का गुलाम, मजहबी जुनून का गुलाम, हैवानियत और बर्बरियत का गुलाम

बंबई शहर, जो उन्हें बेहद प्रिय था तथा जिससे वे बेहद प्यार करते थे, उन्हें छोड़ना पड़ा। वे मरते दम तक उसके लिए तरसते रहे। उन्हें विभाजन के बीज सिनेमा जैसे अधार्मिक क्षेत्र में भी नजर आने लगे थे। उन्हें जब पता चलता है कि अशोक कुमार, जिनके साथ वे बॉम्बे टॉकीज में काम करते थे, को धमकी भरे पत्र (हेट मेल) मिल रहे हैं तथा उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे कंपनी में मुसलमानों को शामिल करने के लिए जिमेमेदार हैं, तो वे बेहद द्रवित हैं। उनका दिल टूट जाता है कि जो लोग उन्हें सआदत हसन मंटो की नजर से देखते थे, उन्हें अब मुस्लिम की नजर से देख रहे हैं। न चाहते हुए भी इन सबसे तंग आकर वे एक नए मुल्क (पाकिस्तान) चले जाते हैं, जिसे वे जानते भी नहीं थे।

वे पाकिस्तान तो चले जाते हैं, पर विभाजन को कभी स्वीकार नहीं करते। उनकी इस अस्वीकृति की अभिव्यक्ति हमें उनकी कई कहानियों में नज़र आती है। टोबा टेक सिंह में यह अभिव्यक्ति स्पष्ट जाहिर भी होती है, जिसमें अस्पताल के अलावा बाकि बाहर की दुनिया पागल हुए जा रही है। उपमहाद्वीप के नेता इतने पागल हुए जा रहे हैं कि वे पागलों की भी अदला-बदली कर रहे हैं। वे पागल जो मुस्लिम हैं उन्हें पाकिस्तान वापिस लाया जा रहा है और जो गैर-मुस्लिम हैं उन्हें भारत भेजा जा रहा है। इनमें अकेला बिशन सिंह जाने से इनकार कर देता है क्योंकि वह पंजाब के एक छोटे से शहर टोबा टेक सिंह में, जहां उसका जन्म हुआ था, उसके परिवार ने ज़िंदगी जी थी, रहना चाहता है। वह न तो पाकिस्तान और न ही हिंदुस्तान में, बल्कि टोब टेक सिंह में रहना चाहता है।

उनकी कहानी मोजील धर्म के प्रभाव को उजागर करती है। साथ ही उस पर व्यंग्य भी करती है। मोज़ील का निर्वस्त्र बिना वजह मर जाना धर्म को बिना वजह धारण करना है जो त्रिलोचन की पगड़ी में निहित है। मोजील के उस कथन से इस बात की पुष्टी होती है, जब मरते वक्त त्रिलोचन उसके बदन को अपनी पगड़ी के कपड़े से ढकने की कोशिश करता है, और मोजील कहती है अपने इस धर्म को ले जाओ!

टिटवाल का कुत्ता में भी वे लोगों के पागलपन तथा शक्ति और अधिकारियों पर व्यंग्य करते हैं। ये बता पाना कठिन है कि कुत्ता एक देशभक्त की तरह मारा गया या उन्होंने अपने देश की कठोर धार्मिक बेवकूफी को मारा है। ऐसा प्रतीत होता है कि वे हिंसा में मनोरंजन का आभास करने लगे हैं।

उनकी कहानी खोल दो हिंसा की सारी सीमाएं तोड़ देती है। वे बुरे या दुष्टता के संदर्भ में धार्मिक समुदाय की विचारधारा का विरोध करते हैं तथा दिखाते हैं कि दुष्ट लोग किस प्रकार अपनी लालसाओं को पूरा करने के लिए ऐसी स्थितियों का फायदा उठाते हैं तथा आपके मज़हब के लोग ही आपको धोखा दे सकते हैं। वे दिखाते हैं कि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता तथा यह अमानवीयता का परिणाम है। सकीना का दोनों ही समुदायों द्वारा शोषण किया जाना इसका स्पष्ट प्रमाण है।

आखिरी सलाम (The last Salute) बिना वजह लड़ने की कहानी है। सैनिक खुद नहीं जानते कि वे क्यों ऐसे देश के लिए लड़ रहे हैं जो उनके लिए अनजान है। वे खुद नहीं जानते कि उन्हें कश्मीर चाहिए या नहीं ?

मंटो को कश्मीर बेहद प्रिय था उतना ही जितना कि मुंबई प्रिय था। इसका इजहार आप पंडित नेहरू को लिखे पत्र में तो देख ही चुके हैं। उनकी कई कहानियां जैसे, आखिरी सलाम और टिटवाल का कुत्ता कश्मीर पर ही केंद्रित हैं। इनका जिक्र पहले भी किया जा चुका है।

कई दफा मंटो विभाजन की इन कहानियों में खुद एक पात्र बन जाते हैं। उदाहरण के लिए सहाय (A tale of 1947) में मुमताज का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान जाना तथा उसके द्वारा अपने मित्र से प्रश्न करना कि क्या वो उसे मार सकता है? ये सब उनकी निजी ज़िंदगियों की झलकियां पेश करते हैं। मंटो ने खुद यह प्रश्न अपने मित्र तथा अभिनेता श्याम से किया था।

आलोक भल्ला विभाजन की कहानियों के संदर्भ में कहते हैं, काल्पनिक लेखन की सबसे अच्छी बात यह है कि ये महज हिंसा की कहानियां ही नहीं बयां करतीं बल्कि इस बात की भी जांच करती हैं कि क्या दहशत के बीच भी हममें कुछ नैतिकता बची थी?

मंटो भी अपने लेखन में इस बात की जांच करते हैं। मंटो सियाह हाशिए के संदर्भ में कहते हैं लम्बे अरसे से मैं देश के बंटवारे से उपजी उथल पुथल के नतीजों को स्वीकार करने से इनकार करता रहा। महसूस तो मैं अब भी वही करता हूं पर मुझे लगता है कि आखिरकार मैंने अपने आप पर तरस खाए या हताश हुए बगैर उस खौफनाक सच्चाई को मंजूर कर लिया। इस प्रक्रिया नें मैंने इनसान के बनाए हुए लहू के इस समंदर से अनोखी आब वाले मोतियों को निकालने की कोशिश की। मैंने इनसान को मारने वाले इनसानों की एकचित धुन के बारे में लिखा जो समझ नहीं पा रहे थे कि उनमें अब तक कुछ इंसानी जज़्बे बाकि कैसे रह गए। इन तमाम और इनके अलावा और भी बहुत सी बातें मैंने अपनी किताब सियाह हाशिए में लिखी हैं

उनकी कहानियों की औरतें

मंटो अपने लिखे अफसानों की वजह से बदनाम हुए। बदनामी का एक कारण उनकी कहानियों की औरतें भी थीं। ऐसी औरतें जिन्हें समाज पसंद नहीं करता। ये औरतें उनकी कहानियों की नायिकाएं भी हैं और खलनायक भी। उनकी सभी कहानियों की औरतें एक जैसी नहीं हैं, जैसा कि समाज सोचता है। उनमें कोई अश्लील है, कोई वेश्या है, कोई अभिमानी है, तो कोई स्वाभीमानी है। यहां तक कि वे खूनी भी हैं। एक औरत मिस्टर हमीदा भी है जो PCOD से पीड़ित है।

मंटो अपनी कहानी की नायिकाओं के बारे में कहते हैं,चक्की पीसने वाली औरत जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मीनान से सो जाती है, मेरे अफसानों की हिरोइन नहीं हो सकती। मेरी हिरोइन चखले की एक टखयाई रंडी हो सकती है। जो रात को जागती है और दिन को सोते में कभी-कभी यह डरावना ख्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उसके दरवाजे पर दस्तक देने आ रहा है। उसके भारी-भारी पपोट, जिनमें वर्षों की उचटी हुई नींद जम गई है, मेरे अफ़सानों का मौजूं (विषय) बन सकते हैं। उसकी गलाजत, उसकी बीमारियां, उसका चिड़चिड़ापन, उसकी गालियां, ये सब मुझे भाती हैं। मैं उसके मुतल्लिक लिखता हूं और घरेलू औरतों की शस्ताकलामियों, उनकी सेहत और उनकी नफासत पसंदी को नजरअंदाज़ कर जाता हूं

दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की प्रोफेसर सुकृता पॉल कुमार कहती हैं कि मंटो अपनी कहानियों में प्रत्यक्ष तौर पर बोलते हैं इसलिए उनमें नाटकीयता नहीं है। उनकी नायिकाएं बिना अश्रु बहाए सिसकियां लेती हैं। वे घृणा और दर्द को झेलते-झेलते अपने दर्द के प्रति शून्य पड़ गई हैं तथा अपनी स्थिति का प्रदर्शन करते हुए समाज के पुरषों पर व्यंग्य करती प्रतीत होती हैं।

मंटो की कहानियों के पुरुष महज खूनी और बलात्कारी ही नहीं हैं। उनमें अब भी मानवीयता बाकि है। पर ये मानवीयता असहाय और कमजोर सी जान पड़ती है, जो स्त्रियों के शोषण और पतन का कारण बनती है। कभी-कभी उसकी मौत का भी कारण बन जाती है। उदाहरण के लिए उनकी कहानी द वुमेन इन द रेड रेनकोट (The Woman in the Red Raincoat) में यह स्पष्ट जाहिर भी होता है- ‘तुम दो औरतों के खूनी हो। एक वो, जो मशहूर कलाकार थी और दूसरी वो जिसका जन्म तुम्हारे लिविंग रूम में मौजूद उस पहली औरत के शरीर से हुआ था जिसे तुमने उस रात अकेला छोड़ दिया था’।

 

मैं क्यों लिखता हूं

मंटो से ही सुन लीजिए कि वे क्यों लिखते हैं ?

मैं लिखता हूं इसलिए कि मुझे कुछ कहना होता है। मैं लिखता हूं इसलिए कि कुछ कमा सकूं ताकि मैं कुछ कहने के काबिल हो सकूं। रोटी और कला का संबंध प्रगट रूप से अजीब-सा मालूम होता है, लेकिन क्या किया जाए कि खुदाबंद ताला को ही यह मंज़ूर है। वह खुद को हर चीज से निरपेक्ष कहता है, यह गलत है। वह निरपेक्ष हरगिज नहीं है। उसको इबादत चाहिए। और इबादत बड़ी ही नर्म और नाजुक रोटी है। बल्कि यूं कहिए, चुपड़ी हुई रोटी है जिससे वह अपना पेट भरता है।

सआदत हसन मंटो लिखता है इसलिए कि वह खुदा जितना बड़ा अफसानासाज और शायर नहीं, यह उसकी आजिजी है जो उससे लिखवाती है।

मैं जानता हूं कि मेरी शख्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बड़ा नाम है। अगर यह खुशफहमी न हो तो जिंदगी और भी मुश्किल बन जाए। पर मेरे लिए यह तल्ख़ हकीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूंढ़ नहीं पाया हूं। यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है। मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूं।

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