आज ही के दिन बना था मुहम्मदीन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल

सुकृति गुप्ता, रीडर्स मेल || हाल ही में मुहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को लेकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बड़ा बवाल हो गया था। बवाल करने वालों ने इसे देश के लिए एक बड़े संकट के रूप में पेश किया। जिन्ना को बांटने वाला कहा। अकेले उन्हें ही देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार मान लिया। उनका तर्क था कि उन्हें देश को देशद्रोही विचारों से बचाना है इसलिए जिन्ना की तस्वीर हटाना ज़रूरी है। वो अलग बात है कि जिन्ना की तस्वीर हटाने वाली बात उन्हें कई सालों बाद याद आई। यह तस्वीर एएमयू के छात्र संघ के दफ्तर में 1938 से लगी है।

एएमयू का आदर्श वाक्य (Motto) है- इंसान को वह सिखाना जो वह नहीं जानता। (taught man what he knew not) जिन्ना और एमयू को कोसने वालों को भी इस बात पर गौर फरमाना चाहिए और वो जानने की कोशिश करनी चाहिए जो वह नहीं जानते। आप सोच रहे होंगे कि मैं भी क्या बात करने लगी! कायदे से बात मुहम्मदीन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल की होनी चाहिए थी। फिर ये जिन्ना, एएमयू और उन्हें कोसने वाले कहां से आ गए?

फिक्र मत कीजिए। कोसने वालों ने इतिहास पढ़ा हो या न पढ़ा हो, हमने पढ़ा है। दरअसल, ये पुराना वाला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय है। पुराने वाले से क्या मतलब है?  एएमयू तो खुद इतना पुराना है। 1920 में बना था यह। मुहम्मदीन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल इससे भी पुराना है। 24 मई 1875 में सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ में इस स्कूल की स्थापना की थी। यही स्कूल बाद में 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना। ठीक उसी तरह जिस तरह एंग्लो अरेबिक कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय का जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज बना।

इस स्कूल के मुख्य इंजीनियर नवाब सरवर जंग थे (Nawab Sarwar Jung) थे। इससे पहले सैयद अहमद खान दो स्कूल और खोल चुके थे। ये स्कूल सैयद अहमद खान ने मुस्लिमों को शिक्षित और जागरूक करने के लिए खोले थे। इसी कड़ी में एम.ए.ओ. कॉलेज (मतलब मुहम्मदीन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज) के साथ ही अलीगढ़ आंदोलन शुरू होता है। संक्षेप में कहें तो इस आंदोलन का मकसद मुसलिमों को पश्चिम की तरह आधुनिक शिक्षा देना था। इस स्कूल का निर्माण भी इसी तर्ज पर किया गया था। खान ने इससे पूर्व ऑक्सफोर्ड और केम्ब्रिज का दौरा किया था। वे ब्रिटिश मॉडल के आधार पर ही भारत में शिक्षा व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे। यह स्कूल उसी व्यवस्था का हिस्सा था।

इस स्कूल को बनाने के लिए कई लोगों से चंदा इकट्ठा किया गया था। उनमें से कुछ के नाम हम आपको गिना रहे हैं। उस समय के गवर्नर जनरल लार्ड नॉर्थब्रूक (Lord Northbrook) ने इसके लिए 10000 रुपये चंदे में दिए थे। उत्तर पश्चिम प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने 1000 रुपये दिए थे। मार्च 1874 तक स्कूल के लिए 1,53,492 रुपये 8 आना इकट्ठे हो चुके थे। तत्कालीन पटियाला के महाराजा ने 58,000 रुपये तथा बनारस के राजा शंभु नारायण ने 60 रुपये सहयोग राशि के रूप में दिए थे।

पहले यह मैट्रिक परीक्षा के लिए कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था। बाद में यह 1885 में अलाहबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हो जाता है। 1877 में लार्ड लिटन (Lord Lytton) इसे कॉलेज का रूप देते हैं। 1900 में कॉलेज का विस्तार होता है तथा 1920 में यह यूनिवर्सिटी का रूप ले लेती है और इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय की मान्यता मिल जाती है। वही यूनिवर्सिटी, जिसे आज हम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के नाम से जानते हैं।

यूनिवर्सिटी में 1927 में नेत्रहीनों के लिए एक स्कूल खोला जाता है। उसके अगले वर्ष यानि 1928 में एक मेडिकल स्कूल खोला जाता है तथा 1930 तक यूनिवर्तिटी में इंजीनियरिंग विभाग की भी शुरुआत हो जाती है। यूनिवर्सिटी में महिलाओं को शिक्षित करने की शुरुआत 19 अक्टूबर 1906 को गर्ल्स स्कूल की स्थापना के साथ होती है। बाद में यही स्कूल 1929 में कॉलेज का रूप ले लेता है तथा 1930 में इसे वुमेन कॉलेज का नाम दिया जाता है। तब से लेकर आज तक यह कॉलेज लड़कियों को ग्रेजुएट कर रहा। मतलब अब भी चल रहा है।

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