आखिर माता-पिता के लिये एक ही दिन क्यों ?

ज्योति सिंह, रीडर्स मेल || बच्चों की परवरिश में जितना स्नेह एक मां का होता है, उतनी ही जिम्मेदारी एक पिता की भी होती है। किसी एक को अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता। माता-पिता के लिये हर दिन खास होता है ये किसी एक दिन का मोहताज नहीं। बदलते समय में फादर्स-डे हो या मदर्स-डे इनकी अपनी ही अहमियत है। भागदौड़ भरी जिंदगी में सभी व्यस्थ हो चुके हैं न रिश्तों की कदर है न ही इनकी इज्जत। मौजूदा हालात में ऐसे दिन का होना उन सभी बच्चों को याद दिलाता है जो भूल चुके हैं कि घर में भी कोई है।

पिता की ख्वाहिश होती है कि उनके बच्चें उनसे दस कदम आगे हों, उन सभी ऊंचाइयों को छूकर एक मुकाम हासिल करें। जिसके लिये वो इतनी मेहनत करते हैं वो एक दिन सफल हो सकें। उसी मेहनत का परिणाम है कि निम्न तबके के बच्चे भी हर क्षेत्र में आगे आ रहे हैं। माता-पिता अपने बच्चों को पालने में पूरी जान लगा देते हैं ताकि उनका भविष्य सुनहरा हो सके। वो सारी खुशियां उनके कदमो में लाने के लिये दिन रात मेहनत करते हैं। बच्चों के कहने से पहले ही उनकी जरूरत का सामान बच्चों को दे दिया जाता है। कोई मजदूरी करके तो कोई कारोबार करके, सबकी अपनी क्षमता होती है। लेकिन सबका प्यार एक ही है। वर्ग बदलने से इसमे कमी नही आती है।

लेकिन जब बच्चों का वक्त आता है तो वे अपने माता-पिता से मुह मोड़ लेते हैं, पर बच्चे भूल जाते हैं कि आज जो वो अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं वो कल उनके साथ भी हो सकता है। बुढ़ापे में माता-पिता बच्चों पर निर्भर होते हैं, माता-पिता सोचते हैं कि जिन बच्चों के लिए उन्होंने सारी जिंदगी मुश्किलें झेली और उन्हे अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया, अब समय उनके बच्चों का है उनकी देख रेख का है। लेकिन होता इससे अलग ही है। कुछ बच्चे या तो उन्हें मारते हैं या उनसे काम कराते नजर आते हैं, तो कुछ अपने मां-बाप को भटकने के लिये छोड़ देते हैं।

कलयुग है यहां सब सम्भव है। ये कहते ही सुना था लेकिन मौजूदा हालात में देख भी लिया। इसी से जुड़ी एक फिल्म भी आई थी ‘बागबान’। फिल्म उसी सच्चाई को सामने लाती है कि कैसे मां-बाप बूढ़े होने के बाद बच्चों को बोझ लगने लगते हैं।

आपको बता दें कि आज फादर्स-डे है। ये दिन पिता के लिये खास दिन होता है। इस दिन बच्चे उनके लिये कुछ उपहार देकर उनका सम्मान करते हैं। अलग-अलग तरह से अपने पिता के लिए अपनी भावनाएं दिखाते हैं। लोग अपने-अपने हिसाब से इसे मनाते हैं। लेकिन ऐसे में उन सभी पर प्रश्न उठता है कि आखिर एक ही दिन पिता का स्नेह क्यों  याद आता है। बहुत से लोग सोशल मीडिया पर आज के नाम पर  पिता के साथ फोटो लगाएंगे और दुनिया भर का प्यार दिखाएंगे। लेकिन सवाल बस इतना ही उठता है कि आखिर बाकि दिन का हिसाब कौन करेगा ?

चलिए एक ही दिन सही कम से कम उन्हें याद तो आता है कि घर में भी कोई है जिन्हें उनके प्यार और समय की जरूरत है। सोचने की बात है कि समय बदल रहा है, समय के साथ लोग भी बदल रहे हैं। लेकिन इतने भी न बदलिये कि माता-पिता की आशाओं पर खरे ही न उतर पाएं। माता-पिता की तम्मना यही रहती है कि आप उनका उसी तरह से ख्याल रखें जैसा की कभी उन्होंने आपका रखा था।

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