जिंदगी बंजर हो गई है, पानी डालकर, उसे हरा कर दीजिए

नल अगर सूखे पड़ जाएं

तो आंखों में थोड़ी नमी ले आना

मैं प्यासा हूं

अपनी पलके झुकाकर

मुझे गीला कर देना

बंजर पड़ी ज़िंदगी को

हरा कर देना

मेरी सांसे बचाकर

अपनी सांसें बचा लेना…

                 पीतम पुरा के महिन्द्रा पार्क के बस स्टैण्ड पर कभी उतरें, तो सामने वाली सड़क पर एक बार ज़रूर गौर फ़रमाएं। उसके डिवाइडर पर वो पोस्टर लगा दिखेगा जिस पर लिखा होगा ‘नन्हा पौधा कहता है- आप मुझे पानी दो, मैं ताज़ी हवा दूंगा!’ आप जब इन पंक्तियों को पढ़ेंगे, तो ऊपर लिखी पंक्तियों का अर्थ समझ पाएंगे।

हमने ज़रा और गौर फ़रमाया तो प्लास्टिक की बोतलों को काट कर बनाएं नन्हें गमलों से नन्हें पौधों की नन्हीं शाखाओं को लटकते देखा। हमने इन्हें लगाने वालों के बारे में पता किया, तो पता चला कि वहां कोई ‘नेचर लवर गैंग’ है जो ये सब काम करता है। जी, हमने उन्हें यह नाम खुद दिया है। पहले मजाक में दिया था, पर काम ज़रा सीरियसली कर रहे थे, इसलिए सीरियसली खिताब दे दिया।

दिल्ली में प्रदूषण वाली बात बेहद सीरियस है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट से भी यह जाहिर होता है। इस रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली विश्व के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार है। इसलिए लगा कि कोई कुछ कर रहा है, तो मिलना चाहिए।

इस गैंग के पंकज अरोड़ा से हम मिले। एक नहीं दो मुलाकातें कीं। पहले लगा था कि ज़रूर कोई बूढ़ा आदमी होगा। कम से कम 50 बरस का तो होगा ही! मिले तो उम्र का अंदाज़ा लगाना थोड़ा मुश्किल हो गया, क्योंकि दाढ़ी तो थोड़ी-थोड़ी सफेद हो चुकी थी पर जोश में जवानी झलक रही थी। दाढ़ी अगर पूरी सफेद हो या पूरी काली हो तो उम्र का ठीक से अंदाज़ा लगाया जा सकता है. कुछ सफेद और कुछ काली हो तो उम्र को लेकर कंफ्यूजन हो जाती है। खैर, ज़्यादा कन्फ्यूज होने की बजाए हमने उनसे पूछ लिया कि उनकी उम्र कितनी है। उन्होंने झट से जवाब दिया 41 बरस। मतलब उम्र के लिहाज से न जवान, न बूढ़े। पर इरादें जवाँ थे, हरे थे। ज़मीन में जो बंजरपन आ गया है, उसे हरा करने की कोशिश कर रहे हैं। हवा जो कार्बन डाइऑक्साइड समेत तमाम ज़हरीली गैसों के गुस्से से गर्म हुई जा रही है, उसे कूल करने की कोशिश कर रहे हैं, बिलकुल अपने कूल अंदाज़ की तरह।

वे दो अहम बातें कहते हैं जो नन्हें पौधे वाले पोस्टर से भी इंगित होती हैं। पहली, ‘ये मेरे बच्चे हैं’। यहां बता देते हैं कि उनका एक गोल मटोल सा बेटा है। जितना ख्याल वे अपने इस बच्चे का रखते हैं, उतना ही अपने बाकि बच्चों (मतलब उनके गैंग द्वारा लगाए गए पौधों से है) का भी रखते हैं। अपने हर बच्चे की सेहत का ख्याल करते हैं।

दूसरी बात सेहत से ही जुड़ी है। वे कहते हैं- ‘पेड़ लगाने वाले हज़ारों मिल जाते हैं, पानी देने वाले नहीं मिलते!’ ये बात उन्होंने पहली मुलाकात में कही थी। चूँकि दूसरी मुलाकात लम्बे अरसे बाद हो सकी, तो हमने पूछ लिया कि अब पानी देने वाले मिले हैं ?

उन्होंने कहा कि बहुत ज़्यादा तो नहीं, पर लोगों का रवैया बदला ज़रूर है। जब वे पौधों को पानी देते हैं, या सफाई करते हैं, तो कई दफा रास्ते से गुज़रने वाले लोग रूक जाते हैं, तारीफ करने के लिए। कई दफा बस का ड्राइवर गाड़ी रोक देता है, ये कहने के लिए कि अच्छा काम कर रहे हैं आप! जहां तक पानी देने वाली बात है तो उन्होंने कहा कि अब सरकारी टैंकर आने लगा है, पानी देने के लिए। वे बताते हैं कि अब सरकार की ओर से भी सहयोग मिलने लगा है।

मैं उनसे एक और बेहद अहम प्रश्न करती हूँ। मैं पूछती हूँ- ‘आप जो कर रहे हैं उसे कैसे जारी रखेंगे ? इसे लेकर अपने बच्चे से क्या उम्मीद रखते हैं ?’ वे खुद जवाब नहीं देते। मैं उनसे जो पूछती हूं, वे अपने बेटे से पूछ लेते हैं- ‘बेटा क्या बनना चाहते हो ?’ उनका बेटा झट से कहता है- ‘फारमर’, यानि किसान ? हमारे देश में किसानों की क्या हालत ये हमसे छिपी नहीं है, भले ही सरकार कितना ही छिपाने की कोशिश कर ले। ऐसे में कोई बच्चा अपने पिता से ये कहे कि मैं किसान बनना चाहता हूं, वो भी शहर का बच्चा, तो ये बात वाकई मायने रखती है। उनके पिता मानते हैं कि ‘एग्रीकल्चर’ में स्कोप है। वे अपने बेटे को इसके लिए प्रोतसाहित करेंगे।

खैर, हमने कहा था कि ये एक गिरोह है, प्रकृति प्रेमियों का गिरोह। मतलब पंकज अरोड़ा अकेले नहीं हैं। कई और भी हैं जो इनके साथ काम करते हैं। अब ये कोई तय तो नहीं है कि बस यही लोग काम करें। जो भी शामिल होना चाहता है, हो सकता है। पंकज अरोड़ा बस ये उम्मीद करते हैं कि लोग कूड़ा न फेंके और लगाए गए पौधों को पानी दे दें। खैर, अपने कुछ साथियों के नाम उन्होंने हमें बताए। उनका ज़िक्र हम यहां कर रहे हैं। सुप्रीत सिंह, जसमीत सिंह, जगदीश शर्मा, टेक चंद, गुरुमुख सिंह, अच्छर सिंह, संजय निझावन, राजीव निझावन- ये उनके कुछ साथी हैं, जो उनके साथ स्थायी रूप से काम करते हैं।

इन्होंने पिछली दिवाली के दौरान ये सब शुरू किया था। उसी दौरान, जब दिल्ली में पटाखों पर बैन लगा दिया गया था। सरकार को प्रदूषण से जूझने के लिए यह तरीका मुनासिब लगा था और इन प्रकृति प्रेमियों को पेड़ लगाना मुनासिब लगा।

इस इलाके (पीतम पुरा वाला महिन्द्रा पार्क) में ये अकेला ऐसा गिरोह नहीं है, और न ही ये पहले हैं जो ये हरा-भरा काम कर रहे हैं। यहां सड़क के किनारे ही ‘लक्षमी स्टूडियो’ है। 1996 से ये दुकान यहां है। न महज दुकान के बाहर का हिस्सा ही हरा-भरा है, पर सामने वाली सड़क को बांटने वाले डिवाइडर पर भी हरियाली छाई है। पहले तो लगा कि सरकार ने ये पौधे लगाए होंगे, पर फिर इस इलाके में रहने वाली हमारी सहेली ने बताया कि ये पौधे सरकार ने नहीं, लक्ष्मी स्टूडियो ने लगाए हैं। ये सुनकर हम उनसे मिले। लक्ष्मी स्टूडियों के मालिक विपिन कुमार ने हमें बताया कि पिछले 2 बरस से वे ये काम कर रहे हैं। पौधों की देखभाल के लिए उन्होंने अलग से माली भी रखा है। हमने उनसे पूछा कि दुकान तो इतनी पुरानी है, फिर 2 बरस पहले ही क्यों ? उन्होंने कहा कि अपने दोस्त विजय कुमार से प्रेरित होकर उन्होंने ये सब किया। फिर कहा कि दिल्ली में प्रदूषण भी तो बहुत ज़्यादा है! उन्होंने कहा कि अगर प्रदूषण कम करना है तो ‘सेल्फ करेक्शन’ यानि ‘खुद को सुधारना’ बहुत ज़रूरी है। वे बस यही कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें पेड़ों से लगाव है। इसका सबूत है कि उनके अपने घर में भी करीब 200 पौधे हैं।

महिंद्रा पार्क क्रोसिंग पर एक और दुकान है- ‘नागपाल हैण्डलूम्स’। यहां की सबसे पुरानी दुकानों में से एक है। जब से है, तबसे पेड़ लगा रहे हैं। उनकी दुकान के आगे कैन्स में लगे पौधे दिखेंगे। दुकान के सामने ही कई पेड़ भी लगे दिखेंगे। पेड़ों की ऊंचाई देखकर अंदाज़ा लग जाएगा कि बहुत पहले से पेड़ लगा रहे हैं! इस दुकान के मालिकों में से एक, सतीश नागपाल से हमने बात की। उन्होंने बताया कि वे पहले कैन्स में पौधों को लगाते हैं। जब बड़े हो जाते हैं और कैन्स छोटे पड़ने लगते हैं, तो ज़मीन में लगा देते हैं। जिस जमीन में लगाते हैं, वहां उसका ख्याल भी रखते हैं। बाद में यही पौधे जवान हो जाते हैं। छाया और शीतल हवा देने वाले पेड़ बन जाते हैं। कैन्स में लगे पौधों के पास ही हमने देखा एक नल भी लगा हुआ है। लोग उस नल से पानी भर रहे थे। पानी भरने वालों से पता किया, तो पता चला कि ये नल भी नागपाल हैण्डलूम्स के मालिक सतीश नागपाल ने ही लगवाया है। आजकल दिल्ली में पानी की बड़ी दिक्कत है। हर रोज 200 एमजीडी पानी की कमी महसूस हो रही है। इसको लेकर हरियाणा और दिल्ली सरकार के बीच शीत युद्ध चल रहा है। पर नागपाल हैण्डलूम्स ने जैसे पूरे इलाके के लोगों के लिए अपना नल खुला छोड़ दिया है! यहां अक्सर पानी को लेकर समस्या रहती है। जब सरकार पानी मुहैया नहीं करा पाती तो लोग नागपाल हैण्डलूम्स के नल से ही पानी भरकर ले जाते हैं।

हो सकता है कि ये कदम आपको बहुत बड़े न लगें! पर सरकार ने जो कदम उठाए और उन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया, ये कदम उनसे तो बड़े ही हैं।

हाल ही में ‘भारतीय वन सर्वेक्षण’ ने भी ‘भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट 2017’ जारी की थी। इस रिपोर्ट के अनुसार वनों से आच्छादित क्षेत्रफल में 6778 वर्ग किमी. की वृद्धि हुई है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत को दुनिया के उन दस देशों में 8वां स्थान दिया गया है जहां वार्षिक स्तर पर वन क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा वृद्धि दर्ज की गई है।

ये आंकड़ें अच्छे ज़रूर हैं पर इनकी अच्छाई उस हवा में नहीं दिखती जिसमें हम सांस लेते हैं। खैर, इन सरकारी आंकड़ों को ज़्यादा तवज्जों देने की बजाए हमें ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाने चाहिए। जिस भी घर में एक नया बच्चा जन्म ले, उसके जन्म के साथ पेड़ लगाएं। जब आप ऐसा करेंगे। इनकी देखभाल करके थक जाएंगे। थकान दूर करने के लिए जब गहरी सांस लेंगे और हवा में पवित्रता का आभास करेंगे, तो खुद-ब-खुद समझ जाएंगे कि आंकड़ें बेहतर हुए हैं।

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