एससी-एसटी मामले पर राज्यसभा में बिल पास होने पर शांत हुए दलित संगठन

जुली सिंह, नई दिल्ली ।। एसटी-एससी ऐक्ट को लेकर लंबे समय से लगातार विवाद चला आ रहा है। जिसको लेकर दलित संगठनों ने काफी विरोध प्रदर्शन भी किया था। इसके बाद सरकार ने एससी-एसटी अत्याचार निवारण संशोधन अधिनियम बिल को लोकसभा मे पेश किया। बिल पेश होने के बावजूद भी दलितों ने 9 अगस्त को भारत बंद का ऐलान किया। जिसकी खबर सुनते हीं पूरे उत्तर प्रदेश में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया और सभी जगह सुरक्षाबलों को तैनात कर दिया गया।

लेकिन दलित संगठनो ने गुरुवार 9 अगस्त को होने वाले भारत बंद के अपने फैसला को वापस ले लिया था। बंद का ये फैसला संगठनों ने इसलिए वापस लिया क्योंकि एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत गिरफ्तारी पर जो रोक लगाई थी उसे वापस पलट दिया गया। तुरंत गिरफ्तारी के प्रावधान को फिर से जोड़ने वाले मत को राज्यसभा में गुरुवार को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही ये कानून पहले की तरह ही बहाल हो जाएगा।

भारत बंद का फैसला वापस लेने से पहले हीं केंद्रिय मंत्री रामदास आठवले ने सभी लोगों से यह आग्रह किया था कि कोई भी गुरुवार को होने वाले भारत बंद मे शामिल न हो। उन्होंने सभी से शंति बनाए रखने के लिए अनुरोध भी किया था। बता दें कि लोकसभा में एससी-एसटी बिल के पहले स्वरूप को ही पास कर दिया गया। जिसके बाद ऑल इंडिया आंबेडकर महासभा ने कहा कि ‘एससी/एसटी ऐक्ट को प्रभाव में लाना हमारी एक बड़ी मांग थी और हमें इस बात की बेहद खुशी है के ये मांग जो कि हमारे लिए बहुत जरुरी थी अब पूरी हो चुकी हैं’। ऑल इंडिया आंबेडकर महासभा ने राजनितिक पार्टियों के साथ-साथ सभी नेताओं द्वारा दलित संगठनों की सहायता करने और उनके साथ खड़े रहने के लिए अनका धन्यवाद दिया। दलित संगठनों ने भारत बंद की तारीख को बढ़ाते हुए सरकार से उनकी और मांगों को पूरा करने पर जोर डाला है।

क्या था एससी-एसटी मामला?

महाराष्ट्र में एससी समुदाय से सम्बंध रखने वाले एक व्यक्ति ने अपने अधिकारी सुभाष काशीनाथ महाजन के ऊपर अपने जूनियर साथी के द्वारा जातिसूचक टिप्पणी के बाद दर्ज केस को वापस लेने के दवाब डालने का आरोप लगाया। याचिकाकर्ता ने पुष्टी की है कि उन अधिकारियों ने काशीनाथ महाजन के ऊपर जातिगत टिप्पणी करने का आरोप लगाया है। इन अधिकारियों ने व्यक्ति पर उसकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट के तहत आरोप लगाया था। जब मामले की जांच करने के लिए पुलिस ने उनके वरिष्ठ अधिकारी से अनुमति मांगी तो उन्हे अनुमति नहीं दी गई। इस पर वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया। बचाव पक्ष का कहना है की अगर किसी दलित व्यक्ति के खिलाफ सच कहना भी जुर्म हो जाएगा तो इससे हमारा काम करना भी मुश्किल हो सकता है।

एससी-एसटी ऐक्ट में नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिकार्ड

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देशभर में 2016 से लेकर अब तक कुल 11,060 मामले दर्ज हुए हैं जो एससी-एसटी ऐक्ट से सम्बंधित हैं। इन मामलों पर पूरी छानबीन मे 11,060 में से 935 मामले पूरी तरह गलत साबित हुई है। बता दें कि शिकायत दर्ज होते ही जल्द से जल्द गिरफ्तारी तय होती थी, निर्दोष को भी सजा मिल जाती थी और कानून का दुरुपयोग भी होता था। इस नियम में बदलाव कर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि किसी भी अधिकारी के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज होने पर उसकी गिरफ्तारी तुरंत नहीं की जाएगी। मामले की पूरी जांच कम से कम डिप्टी एसपी रैंक के अधिकारी करेंगे। कोर्ट ने यह भी फैसला सुनाया था कि यदी कोई आम आदमी के खिलाफ इस मामले में केस दर्ज होता है तो उसकी भी गिरफ्तारी एसपी या एसएसपी की इजाजत के बाद हीं होगी और व्यक्ति को अग्रिम जमानत भी दी जाएगी।

ये सभी फैसलें एससी-एसटी संगठन को मंजूर नहीं था और उन्होंने इसके खिलाफ आंदोलन किया और 9 अगस्त को भारत बंद का ऐलान भी किया था। इसके बाद अब लोकसभा और राज्यसभा दोनों में ही एससी-एसटी बिल पास कर दिया गया और यह सभी फैसले वापस भी ले लिए गए हैं।

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