समाजकार्य के भारतीय पाठ्यक्रम की मांग को मिला डीयू के छात्रों का समर्थन

न्यूज डेस्क, नई दिल्ली ।। सन 1947 में आजादी के भाषण में पंडित नेहरू ने भारत को एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया। आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां अपने विकास की नींव रखने की थी। आजादी की लड़ाई के लिए कागजी और व्यावहारिक दोनों ही तरह के संघर्ष हुए। भारत ने आजादी के लिए नीतियां बनाई और उनको पूरा करने का पुरजोर प्रयास किया। आखिरकार सन 1947 में माउंटबेटन ने आजादी के नाम पर भारत और पाकिस्तान दो राष्ट्र बनाए। भारत को संघर्षों के परिणाम स्वरूप आजादी तो मिली लेकिन उस आजादी को बरकरार रखते हुए आगे विकास की नींव रखने के लिए कोई नीति नहीं मिली। इसीलिए भारत ने अपने लोकतंत्रात्मक गणराज्य को चलाने के लिए अंग्रेजों द्वारा चलाई जा रही कार्यप्रणाली को बनाए रखा। न्यायिक प्रकिया और देश को चलाने के लिए बने संविधान को भी अंग्रेजी से कुछ सुधारों के साथ उठा कर अपना लिया गया।

आजादी के बाद स्वत: अपनाए गई कार्यप्रणाली कुछ समय तक भारत के लिए कारगर रही लेकिन समय के साथ-साथ भारत को और बेहतर नीतियों की जरूरत पड़ी। धीरे-धीरे भारत ने अपना दमखम दिखाने के लिए खुद की नीतियां बनाई। भारत ने समय समय पर अपने न्यायिक, संवैधानिक, आर्थिक और राजनीतिक खाकों पर काम किया और उन्हें अपने विकास अनुसार ढालने का प्रयास किया। ये परिवर्तन जरूरी भी थे लेकिन उससे भी जरुरी था कि ये परिवर्तन हर क्षेत्र में हों लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आजादी के बाद जितनी भी खोज हुई, अविष्कार हुए, साहित्य लिखे गए उसमें भारत की काबिलियत तो दिखी, लेकिन इन सबके बीच सबसे चितांजनक बात ये रही कि ये सभी उपलब्धियां पुराने पाठ्यक्रमों के आधार पर मिली। आजादी के बाद पाश्चात्य संस्कृति से अपनाए गए लगभग सभी क्षेत्रों में बदलाव हुआ लेकिन शिक्षा को आज भी उसी ढर्रे और अपनाए गए पाठ्यक्रम पर चलाया जा रहा है।

पाठ्यक्रम के उसी पुराने ढर्रे से आजादी के लिए अब संघर्ष शुरू हो चुके हैं। देश के कई विश्वविद्यालयों में सामाजिक कार्य के पुराने पाठ्यक्रम को बदलकर भारतीय परिप्रेक्ष्य को सामाजिक कार्य पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांगे पिछले कुछ समय में तेजी से सामने आई। इस संदर्भ में अब तक देशभर से प्रोफेसरों द्वारा मांग की जा रही थी, इसी बीच बच्चों ने भी पुराने पाठ्यक्रम के खिलाफ आवाजे उठानी शुरू कर दी है। हाल ही में इस संबंध में दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉक्टर भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय के कुछ छात्रों ने स्नातक पाठ्यक्रम के भारतीयकरण की मांग को लेकर प्रधानमंत्री व मानव संसाधन एवं विकास मंत्री को चिट्ठी लिखकर अपनी आवाज उठाई।

मौजूदा पाठ्यक्रम एंव उसका आधार

हमारे देश में राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, मदर टैरेसा जैसे बड़े-ब़डे समाज सुधारक रहे हैं लेकिन फिर भी समाज कार्य विषय के विद्यार्थी यूरोप व अमेरिका के समाजसेवियों व विद्वानों के बारे में पढ़ते आ रहे हैं। सन 1936 में भारत में सामाजिक कार्य शिक्षा की शुरुआत ‘सर दोराबजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल ऑफ सोशल वर्क’ (वर्तमान में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज) मुंबई की स्थापना से हुई थी। तब से लगभग आज 80 वर्ष बाद भी वही पाठ्यक्रम चला आ रहा है। देशभर के विद्यार्थी उसी पुराने पाठ्यक्रम को पढ़ते हैं और अपने देश में सामाजिक कार्य के औचित्य और स्वरूप से दूर रह जाते हैं।

सर्वप्रथम स्वदेशी पाठ्यक्रम

पाठ्यक्रम के स्वदेशीकरण की मांग को देखते हुए महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) देश का पहला ऐसा विश्वविद्यालय बन गया है जिसमें समाज कार्य विषय का स्वदेशी पाठ्यक्रम लागू हो चुका है। ये अपने आप में सामाजिक कार्य के विद्यार्थियों और सामाजिक कार्य के स्वदेशीकरण की चाह रखने वालों की बड़ी विजय थी। इस नए सत्र से विद्यार्थी इसी पाठ्यक्रम को पढ़ेंगे। इस पाठ्यक्रम में पहली बार भारतीय पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे, नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी, नानाजी देशमुख के सामाजिक चितंन और कार्यों के बारे में पढ़ने को मिलेगा।

देशभर से मांगे जा रहे सुझाव

डॉ. बिष्णु मोहन दास, प्रोफेसर, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय

पाठ्यक्रम के बदलाव की जरूरत और मांग को देखते हुए हाल ही में यूजीसी की स्थायी समिति के चेयरमैन द्वारा स्नातक स्तर पर पाठ्यक्रम में बदलाव हेतु सुझाव आमंत्रित किये गये थे। इस आमंत्रण में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. डॉ. बिष्णु मोहन दास ने समाज कार्य पाठ्यक्रम को यूरोपीयवाद से मुक्त करने, सामाजिक कल्याण और सामाजिक कार्य पर भारतीय परिप्रेक्ष्य, प्रासंगिक भारतीय वैदिक, शास्त्रीय ज्ञान, भारतीय अनुभव और भारतीय मूल्यों को पाठ्यक्रम में समाहित करने जैसे सुझाव दिये। प्रोफेसर दास की समाज कार्य पाठ्यक्रम के भारतीयकरण के मुद्दे में अहम भूमिका रही है। प्रो. दास के साथ पाठ्यक्रम के स्वदेशीकरण में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों का रुझान भा बढा। पाठ्यक्रम के भारतीयकरण के मुद्दे में इन छात्रों की अहम भूमिका देखने को मिल रही है। इस मामले में अब दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के रुझान के साथ-साथ पाठ्यक्रम के भारतीयकरण व भारतीय समाज कार्य दिवस को 11 अक्टूबर को मनाने के विषय में एकमत स्पष्टता नजर आ रही है।

11 अक्टूबर ही क्यों?

इस दिन 1916 में महाराष्ट्र के हिगोंली में नानाजी देशमुख का जन्म हुआ था। नानाजी देशमुख जो कि गरीबी उन्मूलन, ग्रामीण स्वास्थय, ग्रामीण शिक्षा और आदिवासी लोगों के उत्थान के लिए अनुकरणीय योगदान के लिए पद्मविभूषण से भी सम्मानित किये जा चुके थे। उन्होंने दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की और उसमें रहकर समाजसेवा की। नानाजी ने चित्रकूट में चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह भारत का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय है और वे उसके पहले कुलाधिपति भी रहे थे। नानाजी के इन कार्यों की पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी प्रशंसा करते हुए कहा कि विकास के इस अनुपम प्रारूप को सामाजिक संगठनों, न्यायिक संगठनों और सरकार के माध्यम से देश के विभिन्न भागों में फैलाया जा सकता है। शोषितों और दलितों के उत्थान के लिए समर्पित नानाजी चित्रकूट में जो कर रहे हैं उसे देखकर अन्य लोगों की भी आंखे खुलनी चाहिए।

छात्रों की मांग छात्रों की जुबानी

विश्वविद्यालय के छात्रों से बातचीत करने पर डॉ. बी.आर. अंबेडकर महाविद्यालय के समाजिक कार्य के तृतीय वर्ष के छात्र सौरभ ने बताया कि वर्तमान में समाज कार्य का पाठ्यक्रम पूरी तरह से यूरोपीय विचारधारा से प्रेरित है। जिसको भारतीय समाजवाद, संस्कृति, मनोवैज्ञानिक वैचारिक विचारधारा को भी सम्मिलित करने की आवश्यकता है। वहीं, प्रथम वर्ष के छात्र निपुण ने भारतीय समाज, वैदान्तिक परिभाषाओं के साथ-साथ भारतीय समाज सुधारकों जैसे- राजा राम मोहन राय, अन्ना हजारे, डॉ बी.आर. अंबेडकर तथा जयप्रकाश नारायण आदि के विषय को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने की बात पर जोर दिया। वहीं एक और द्वितीय वर्ष के छात्र अजय ने भी इसके समर्थन में आते हुए कहा है कि एक तरफ तो सरकार स्वदेशी को बढ़ावा देने की बात करती है, लेकिन जब सामाजिक कार्य के पाठ्यक्रम की बात आती है तो आज भी बच्चों को यूरोपीय विचारधार का पाठ्यक्रम ही पढ़ाया जा रहा है। ऐसे में छात्र भारतीय पाठ्यक्रम को ही नहीं जानेंगे तो वे कैसे स्वदेश को समझ सकेंगे।

स्पष्ट रूप से दिल्ली विश्वविद्यालय में केवल 2 ही महाविद्यालय ऐसे हैं जहां समाजकार्य विषय स्नातक के रुप में चलते हैं, जिसमें से ज्यादातर बच्चों ने भारतीयकरण की मांग में अपनी आवाज को शामिल किया है।

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