भारत और नेपाल के बिगड़ते रिश्ते

दीपक स्याल, स्पेशल डेस्क ।। भारत और नेपाल का संबंध गंगा और हिमालय जितना ही प्राचीन है और जिस प्रकार आज गंगा प्रदूषित हो गयी है हिमालय कभी भूस्खलन, भूकंप, बाढ से त्रासद है, उसी प्रकार भारत और नेपाल जो कभी एक दूसरे के सुख-दुःख के साथी थे आज केवल एक दूसरे के दुःख का कारण बनते जा रहे हैं। हमारी सरकार चाहे दबी आवाज में जितना मर्जी चीन को कोस ले परन्तु चीन से ज्यादा भारत सरकार ही इस संबंध विच्छेद के लिए जिम्मेदार है।

कहां हुई भारत से चूक?

मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान नेपाल सरकार ने रेलवे लाइन की मांग की थी परन्तु मनमोहन सिंह 10 साल तक नेपाल की मांग को नजर अंदाज करते रहे। नेपाल अपनी मांग को लेकर चीन के पास गया और चीन ने नेपाल में रेलवे ट्रैक बिना विलम्भ के बिछाना शुरु भी कर दिया। आपको बता दे कि वर्तमान समय में भारतीय रेल जयनगर तक जाती है जो भारत और नेपाल का बॉर्डर है।

नेपाल की अर्थव्यवस्ता अस्त-व्यस्त

चीन के हस्तक्षेप के बाद नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी का परचम लहराया और भारत-नेपाल बॉर्डर पर नाकाबंदी नेपाल द्वारा इतनी सख्त कर दी गयी कि नेपाल में भारत द्वारा रसद में समस्या उत्पन हो गयी। नए नेपाली संविधान पूरी तरह से भारत के विरोध में लिखा गया और देखते ही देखते पहले तेल की आपूर्ति पर रोक लगा दी गयी जिसके कारण नेपाल की अर्थव्यवस्ता तहस नहस हो गयी। नेपाल की धरती पर भारत विरोधी ताकतें जमाने लगी और फल  सब्जियों आदि जैसी अनिवार्य वस्तुओं की रसद पर भी नेपाल के अतिवादी संघटनों द्वारा रोक लगा दी। नेपाल द्वारा एक आर्थिक आत्महत्या की और यह पहला कदम था। नेपाल ने भारत को धमकी देते हुए यह तक बोल दिया कि भारत यदि हमें पेट्रोल नहीं देगा तो हम भारत से सभी रसद रोक चीन की तरफ मुंह मोड़ लेंगे। बाद में भारत-नेपाल के बिच 5 वर्षों तक पेट्रोल आपूर्ति का समझौता हो गया। चीन द्वारा भी नेपाल को 1.3 मिलियन गैसोलीन देने का समझौता किया गया।

नेपाल का भारत विरोधी संविधान

नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी का आना भारत का सबसे बड़ा फेलियर और चीन की जीत था। चीन द्वारा पैसे देकर नेपाली सांसदों को ख़रीदा गया तो रिटायर्ड सांसदों को पेंशन का वादा किया गया। ड्रैगन के इशारों पर नाचते हुए नेपाली राजनेताओं द्वारा एक ऐसे संविधान की रचना की गयी जिसने भारत की पीट पर खंजर का कार्य किया। नेपाल के नए संविधान और इसमें मधेशी एवं थारु जनसंख्या की मांगों को नजरअंदाज कर उन्हें दोयम दर्जे के नागरिक का तमगा दे दिया। जिस पर भारत की नाराजगी समझी जा सकती है, क्योंकि नेपाल के तराई (मधेश) इलाकों में रहने वाले मधेशी वो भारतीय हैं जो सदियों पहले बॉर्डर पार कर नेपाल चले गए थे। आपको यह बता दें कि आज भी भारत में नेपाली लोगों को बराबर का दर्जा दिया गया है। वो सरकारी, प्राइवेट नौकरी कर सकते हैं। स्कूल  कॉलेजे से शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं। ऐसे में नेपाल द्वारा उन्ही के नागरिकों से सौतेला बर्ताव करना सिर्फ इसलिए कि उनके पूर्वज भारतीय थे कहां तक उचित है?

भारत-नेपाल सैन्य सम्बन्धों में खटास

सितम्बर 2018 में नेपाल-भारत के बीच 12 दिन की मिलिट्री एक्सरसाइज होनी थी, जिसे नेपाल द्वारा रद्द कर दिया गया और न केवल रद्द किया गया बल्कि चीन के साथ युद्ध अभ्यास कर नेपाल ने भारत के जख्मों पर नमक भी मल दिया। एक समय था जब नेपाल के गोरखा भारतीय आर्मी में शामिल होते थे, लेकिन आज भारत के साथ-साथ वह गोरखा ब्रिटिश आर्मी, सिंगापुर पुलिस और चीन की तरफ भी रुख लेने लगे हैं।

नेपाल की तरफ से होती है भारत में स्मग्लिंग

पिछले कुछ वर्षों पर नज़र डालें तो चाहे नकली नोट भारत में लाना हो या नक्सलियों तक हथियार पहुंचाने हों, ड्रग्स सप्लाई हो या भारत विरोधी गतिविधिया हों, इन सबके लिए नेपाल की धरती के इस्तमाल में तेजी आयी है।

पीएम मोदी ने कोइराला का समर्थन करके की थी भूल

पीएम मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री पद की दौड़ में सुशील कोइराला का समर्थन किया लेकिन जीत के.पी. ओली की हुई। के.पी. ओली मोदी से नाराज हो कर चीन की तरफ हो गए।

देखने की बात है कि हमारे पड़ोसियों- पाकिस्तान, मालदीव, बांग्लादेश और अब नेपाल के साथ हमारे रिश्ते पहले से बदतर हो गए हैं। देखने की बात यह भी है की चीन पैसे के दम और भारत-नेपाल की कमजोर राजनीति का फयदा उठाकर भारत-नेपाल के रिश्ते में खटास तो ला सकता है, परन्तु न तो वो काठमांडू से हरिद्वार का रिश्ता तोड़ सकता है और न ही दिल्ली का पशुपतिनाथ से।

भारत की तरह ही नेपाल में भी अंतिम यात्रा गंगा से ही होती है और जितनी मान्यता नेपाल में पशुपति नाथ की है उतनी ही भारत में भी है। भारत और नेपाल को इस समय समझदारी से काम लेना चाहिए। भारत लगभग म्यांमार, मालद्वीप को खो चुका है। अब भारत का नेपाल को खोना चीन की सबसे बड़ी जीत होगी, क्योंकि चीन से जंग में नेपाल और भूटान की अहम भूमिका रहेगी। वहीं नेपाल को समझना चाहिए कि विकास के नाम पर आज चीन ने तिब्बत को बर्बाद कर दिया और तिब्बती अपना देश होते हुए भी शरणार्थी बन भारत में रह रहे हैं, तो कुछ तिब्बती चीन की बर्बरता और अत्याचार सहन कर उनकी गुलामी कर रहे हैं।

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