सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी के आंकड़े आपको चौका देंगे

अखिल सिंघल, पोस्टमार्टम ।। हमारे समाज में डॉक्टरों को भगवान के बाद जन्म देने वाला दूसरा शख्स कहा जाता है, क्योंकि डॉक्टर वो व्यक्ति होता है जो पृथ्वी पर जन्में किसी व्यक्ति की जान बचाने में सहायता करते हैं। लेकिन वर्तमान समय में उन्हीं डॉक्टरों की संख्या और जनसंख्या के बीच का अनुपात काफी बढ़ चुका है और यह फासला गरीब व्यक्ति की जिंदगी को संकुचित कर मौत का कारण भी बनता जा रहा है।  सही समय पर इलाज ना मिलने से कई जिलों, ग्रामीणों में गर्भवती महिलाओ, बच्चों और बुजुर्गों की मौत का वजह बनने जैसी खबरों को बड़े स्तर पर सुना व देखा जा सकता है।

वर्तमान समय में डब्ल्यू.एच.ओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन दुनिया के लगभग 190 देशों के नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़े और संबधित चीजों पर कार्य कर रहा है। डब्ल्यू.एच.ओ की रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार विश्व स्तर पर भारत स्वास्थ्य रैंक में 192 देशों की सूची में 143वें स्थान पर है। यह आंकड़े चौकाने वाले जरूर हैं लेकिन आज की सच्चाई और जनता के स्वास्थ्य के प्रति हो रही लापरवाही को बहु रूप में स्पष्ट करते हैं।

विश्व स्तर पर विकसित देशों में नाम लेने से पहले हमें अपनी रैंक को देखना होगा और हमारे स्वास्थ्य बजट पर भी नजर दौड़ानी होगी, क्योंकि भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.3% भाग स्वास्थ्य पर खर्च करता है। इसके विपरीत अमेरिका, ब्रिटेन, श्रीलंका जैसे कम जनसंख्या वाले देशों का स्वास्थ्य बजट भारत के स्वास्थ्य बजट के प्रतिशत से कई ज्यादा अधिक है।

स्वास्थ्य आंकड़ों में इस गिरावट का मुख्य कारण है अस्पतालों में डॉक्टरों की संख्या में कमी होना। वर्तमान समय मे डॉक्टरों की संख्या की स्थिति का जायजा किया जाए, तो इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के आंकड़े बताते हैं कि भारत की 1.3 अरब की जनसंख्या के लिए देशभर में मात्र 10.4 लाख डॉक्टरों का ही पंजीकरण हुआ है। जिनमें 1.1 लाख सरकारी तौर कार्यरत हैं, वहीं लगभग 9 डॉक्टर निजी अस्पतालों में कार्य सेवा में लगे हुए हैं। डब्ल्यू.एच. ओ  ने जनसंख्या और डॉक्टर की संख्या का अनुपात आधार 1000:1 किया हुआ है। लेकिन डब्लू.एच.ओ के ‘द हेल्थ वर्कफोर्स इन इंडिया’ के अनुसार भारत मे डॉक्टरों की संख्या कम होने से यह अनुपात मात्र 0.6 ही है। इनमे से स्त्री रोग, शिशु रोग और सर्जरी विशेषज्ञों की संख्या, आधे से भी कम है। भारत के बिहार, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश जैसे विशाल जनसंख्या वाले राज्यों में डॉक्टरों की कमी सबसे ज्यादा है। वहीं केरल और महाराष्ट्र की स्थिति बाकी राज्यों के मुकाबले थोड़ी बेहतर है। वर्तमान समय के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में प्रति 7400 व्यक्तियों की संख्या पर मात्र 1 डॉक्टर मौजूद है, वहीं बिहार में यह आंकड़े देश को शर्मसार कराने वाले हैं क्योंकि बिहार में प्रति 28 हजार व्यक्तियों पर सिर्फ एक एलोपैथिक डॉक्टर मौजूद है। ऐसे आंकड़ों को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि हमारे देश की सरकार और राज्य सरकार की ढील के चलते ही ऐसी समस्या उतपन्न एवं बढ़ती जा रही है।

भारत के अस्पताल केवल डॉक्टर की कमी से ही नहीं जूझ रहे बल्कि भारत के अस्पतालों में आज नर्सो की संख्या भी काफी कम है। डब्ल्यू.एच.ओ कं अंतर्गत इंडियन नर्सिंग काउंसिल मानकों के अनुसार देशभर के सभी अस्पतालों में लगभग कुल 24 लाख नर्सों की भर्ती होना बाकी है। जिस कारण नर्सों का यह अनुपात भी औसत से कम यानी 0.8 है।

भारत के अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सों की संख्या ही कम नहीं है, बल्कि आज अस्पतालों की स्थिति इतनी कमजोर या लापरवाही इतनी बढ़ चुकी है कि देश के बड़े-बड़े अस्पतालों में आधुनिक चिकित्सकीय उपकरणों, दवाओं, इंजेक्शन की संख्या भी प्रचूर मात्रा में उपलब्ध नहीं है। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर के बाबा राघव दास मैडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से हुई 30 बच्चों की मौतें इस बात का सबूत है। मरीजो कों बिस्तरों की कमी के कारण सही समय पर एडमिट करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा हैं और यदि हाल ही की बात की जाए, तो अक्टूबर-नवम्बर के महीने में डेंगू के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी होने से दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या की कमी के कारण कई गम्भीर हालत में पड़े मरीजों को पैसे की कमी से लाचार होकर जमीन पर लेटकर इलाज कराने के लिए बाध्य होना पड़ा था। डब्ल्यू.एच.ओ ने प्रति हजार व्यक्तियों पर 5 बिस्तर का निर्धारण किया हुआ है बावजूद इसके भारत के अस्पतालों में बिस्तर और मरीजों का अनुपात लगभग 2 की संख्या के पास है।

स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देशभर से प्रत्येक वर्ष 5500 डॉक्टरों की भर्ती होती है। जिनमें से सैंकड़ों की संख्या में कुछ डॉक्टर अच्छे भत्ते और वेतन के कारण विदेशों में प्रवास कर जाते हैं। इंटरनेशनल माइग्रेशन आउटलुक के अनुसार पिछले 10 वर्षों में लगभग 40 हजार डॉक्टरों ने विदेशों में प्रवास किया।

वर्तमान समय में सरकारी अस्पतालों के बिगड़ते हालात और भीड़ के चलते निजी अस्पतालों पर लोगों को ज्यादा आश्रित होना पड़ रहा है। जिस कारण एक रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार देश की कुल 3.9 प्रतिशत आबादी यानी 5.1 करोड़ भारतीय अपने घरेलू बजट का एक चौथाई से ज्यादा खर्च इलाज पर करते हैं। देशभर में कुल 412 मेडिकल कॉलेज हैं जिनमें 45 प्रतिशत सरकारी और 55 प्रतिशत निजी हैं। ऐसे में 1.3 अरब जनसंख्या वाले देश में यह संख्या और खासकर सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या के हिसाब को देखते हुए काफी कम है।

सरकार की तरफ से जीडीपी में स्वास्थ्य पर खर्च किये जा रहे 1.3 प्रतिशत को 2022 तक 2.5 प्रतिशत खर्च करने की बात बेशक की जा रही हों, चाहे कई योजनाएं शुरू की गयी हों लेकिन जब तक अस्पतालों में डॉक्टरों, बिस्तरों और आधुनिक उपकरणों की संख्या पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक लक्ष्य में सफलता का मिलना असंभव सा दिखाई देता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Latest Updates |